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गामक लोक / उदयचन्द्र झा ‘विनोद’

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अपियारी के माछ जकाँ अछि गामक लोक
सहियौने अछि सहत नित्य मारए बेरोक
अश्रुक द्रवणशक्ति नहि बाँचल नीवी बन्द
हत्या कएलक क्यो निरीह गौआँ पैबन्द।

पूर्वक मुखिया ताड़ जकाँ छथि गुमसुम ठाढ़
सम्प्रति प्रमुख गना रहला अछि अपन-पराड़
कुष्टिआएल शब्दक नारा नहि होइ समर्थ।
अनुनय-विनय-प्रयास-प्रतीक्षा भ’ गेल व्यर्थ

फगुआ-सुकराती आशंकित हिंसा-राज
सौमनस्य-दर्शन अछि खेदल गेल स्वराज
सज्जनताक मखौल उड़ाबए बैसल गिद्ध
बोलवा डाकू भ’ गेल राताराति प्रसिद्ध।

हैवानी सम्मानित भ’ चढ़ि रहल मचान
उपभोगक सामान जुटाबए पाछाँ प्राण
सार्थ नहि संवाद ध्येय धूमिल नेताक
बड़ पूजथि दुलहिन भावी छनि जरि जएबाक।

कुसुम नगरमे कुलिशक खोलल गेल दोकान
कर्तव्यक नित पाठ पढ़ाबथि निपट अजान
के कहलक ककरा कहलक से क्यो नहि पूछ
उनटा बहए बसात करै-ए राज उलूक।

शीलक ठोकल दाम वकीलक चलती भेल
बढ़ल मामिला आर गाम गंजनमे गेल
बाँटल गेल रिलिफ विभाजन तहिनाँ भेल
आधा उचिते लोकक खाता राखल गेल।

झूठक आलंबन आवश्यक जीवन लेल
आएल जवानी पानि जकाँ लगले चल गेल
प्रगतिक चर्चा खूब अवगतिक भेल अभाव
आइ होइछ आलोचित गाँधी-सत्य-स्वभाव।

अनुपातक खेती करैत अछि गामक लोक
ककरो पाछाँ ध’ उढ़रै अछि गामक लोक
फूसिक फकरा जोड़ि पढ़ै अछि गामक लोक
आनक खाधि भरै अछि एखनहुँ गामक लोक।

डेबल जकरा सैह खेहारए अद्भुत बात
सेबल जकरा सैह पजारए अजगुत बात
मर्जी हुनकर मगजी मारथि राम-सलाम
दौड़ए क्यो आ दर्ज होइत अछि ककरो नाम।

रंगक तेजल आश लाल-पीयर सभ एक
गाम उजाड़क षडयन्त्रक फरीक प्रत्येक
तर्ज भिन्न अछि अर्ज एक सभहक अविराम
सभ रक्षके अवग्रहमे अछि गामक प्राण।

सात समुद्रक पारवलासँ सीखल मन्त्र
साधल गेल गाम पर सुलभ अदौ के यन्त्र
लड़ल युद्धकें अर्थहीन करबाक नेयारर
अलबटाहि रानीकें नहि छनि वस्त्र सम्हार

गरजए जे तकरे पाछाँ भ’ रहल समाज
अपन घर फूकैमे नहि भ’ रहलै लाज
अग्नि-परीक्षा एक बेर फेरो आसन्न
हक्का-बक्का लोक एखन धरि सुलभ न अन्न
खन रौदी खन दाही सभक कारण राज
लोक मरै-ए लोकनाथकें तकर न लाज
पाँती-पाँतीमे बैसल अछि पापी एक
देखक अछि कतबा सकैछ अपलापी एक।

करूणाके स्थान रौद्र ल’ रहल समस्त
व्यस्त लोककें व्यर्थ बुझी जुनि अपने सस्त
ठकल बहुत अछि गेल आब नहि प्रस्तुत लोक
केरा के भालरि नहि छी हम ब’ड़-अशोक

बेल-बबूरक छाया भोगल बूझल भेल
थरथर काँपए लोक अतर्कित सूझल खेल
तामस हम तकैत छी बाँचल तकरे काज
राकस हम तकैत छी आब न चलते ब्याज

आइ एक बेर बैसि करब हम दुर्गा-पाठ
सहियौने अछि लोक हाथमे सबल समाठ
चलत आब नहि बहुत चलल अछि हबा कहैत
एना कतहु दुश्मनी होइक नित संग रहैत।

जागल गामक लोक हिलत सिंहासन आइ
बधिकक चिग्घारब नहि चलते जानू भाइ
अनुशासित दीक्षित सेनाक जागरण भेल
बीतल निशा नवल भोरक शुभागमन भेल।