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गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/ पृष्ठ 10

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राग जैतश्री
देखौ, राघव-बदन बिराजत चारु |
जात न बरनि, बिलोकत ही सुख, मुख किधौं छबिबर नारि सिङ्गारु ||

रुचिर चिबुक, रद-ज्योति अनूपम, अधर अरुन सित हास निहारु |
मनो ससिकर बस्यो चहत कमल महँ प्रगटत, दुरत, न बनत बिचारु ||

नासिक सुभग मनहुँ सुक सुन्दर चितवत चकि आचरज अपारु |
कल कपोल, मृदु बोल मनोहर रीझि, चित चतुर अपनपौ वारु ||

नयन सरोज, कुटिल कच, कुण्डल भ्रुकुटु, सुभाल तिलक सोभा-सारु |
मनहुँ केतुके मकर, चाप-सर गयो, बिसारि भयो मोहित मारु ||

निगम-सेष, सारद, सुक, सङ्कर, बरनत रूप न पावत पारु |
तुलसिदास कहै, कहौ, धौं कौन बिधि अति लघुमति जड़ कूर गँवारु ||