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गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 5


(15)

कपिके चलत सियको मनु गहबरि आयो |
पुलक सिथिल भयो सरीर, नीर नयनन्हि छायो ||

कहन चह्यो सँदेस, नहि कह्यो, पियके जिय की जानि
हृदय दुसह दुख दुरायो |
देखि दसा ब्याकुल हरीस, ग्रीषमके पथिक ज्यों धरनि तरनि-तायो ||

मीचतें नीच लगी अमरता, छलको न बलको निरखि थल
परुष प्रेम पायो|
कै प्रबोध मातु-प्रीतिसों असीस दीन्हीं ह्वैहै तिहारोई मनभायो ||

करुना-कोप-लाज-भय-भरो कियो गौन, मौन ही चरन कमल
सीस नायो |
यह सनेह-सरबस समौ, तुलसी रसना रुखी, ताही तें परत गायो ||