(15)
कपिके चलत सियको मनु गहबरि आयो |
पुलक सिथिल भयो सरीर, नीर नयनन्हि छायो ||
कहन चह्यो सँदेस, नहि कह्यो, पियके जिय की जानि
हृदय दुसह दुख दुरायो |
देखि दसा ब्याकुल हरीस, ग्रीषमके पथिक ज्यों धरनि तरनि-तायो ||
मीचतें नीच लगी अमरता, छलको न बलको निरखि थल
परुष प्रेम पायो|
कै प्रबोध मातु-प्रीतिसों असीस दीन्हीं ह्वैहै तिहारोई मनभायो ||
करुना-कोप-लाज-भय-भरो कियो गौन, मौन ही चरन कमल
सीस नायो |
यह सनेह-सरबस समौ, तुलसी रसना रुखी, ताही तें परत गायो ||