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गीत कुँवारे / धीरज श्रीवास्तव

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खुली आँख में बैठ गये हों
जब आकर सन्यासी सपने
राजमहल में फिर हम सोयें
मीत हमारे, ठीक नहीं है।

जंगल-जंगल पर्वत -पर्वत
खाक छानते हम फिरते हैं !
जनम जनम के हम हैं जिद्दी
चढ़ते वहीं जहाँ गिरते हैं !
बैठ चाँदनी उस पर दिल की
रीत सँवारे, ठीक नहीं है।

आँसू से नित करें आचमन
हवन कुण्ड में हाथ जलायें !
यज्ञ विखण्डन को आकुल हैं
किन्तु धरा की सभी बलायें !
ऐसे में फिर बैठें गायें
गीत कुँवारे, ठीक नही है।

सदियों से है यह जग बैरी
सिर्फ दुखों से है याराना !
वीरानों के हम हैं आदी
बाजारों ने कब पहचाना ?
उस पर हमको सुबह शाम फिर
प्रीत पुकारे, ठीक नहीं है।