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गीत 11 / अठारहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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अहंकार के वचन न बोलै
सात्विक धीरजवान पुरुष सत-पथ से कभी न डोलै।

कर्म और ओकरोॅ फल के जे बन्धन में नै आवै
धन-दौलत अरु मान-बड़ाई जेकरा कभी न भावै
पुत्र और नारी के बन्धन भी धीरे से खोलै
अहंकार के वचन न बोलै।

कारज सिद्धि-असिद्ध पर नै हरख-विषाद बुझावै
सदा रहै उत्साहित, कखनोॅ कर्ता भाव न लावै
आतम में जे परमातम के अन्दर झाँकि टटोलै
अहंकार के वचन न बोलै।

जे कर्मो से आसक्ति राखै, संग-संग फल चाहै
लोभ-लाभ के मनन करै, स्वारथवश वैर निबाहै
राजस राखै अशुभ आचरण, जीवन में दुख घोलै
अहंकार के वचन न बोलै।

जे राखै ममता आसक्ति से कहलावै रागी
धन संचय में रहै हमेशा से लोभी सुख त्यागी
से अपनोॅ जीवन के नैया अपनोॅ हाथ डुबोलै
अहंकार के वचन न बोलै।