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गीत 19 / दोसर अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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जे इन्द्रिय के बस में प्राणी, से अब अ-स्थिर छै।
जिनकोॅ इन्द्रिय सब विधि संयत, उनके बुद्धि स्थिर छै।
अज्ञानी-ज्ञानी के बीचें
निशि-वासर सन अंतर
अज्ञानी जन मोह निशा में
सूतल रहै निरन्तर
जैसे उल्लू के दिन में भी, सूझै घोर तिमिर छै।
अन्तः जिनका जोत जगै
अज्ञान तिमिर से नासै
ज्ञानी जन अन्तःप्रकाश से
जग के सदा प्रकाशै
निशि वासर बस जागै जोगी, जिनकर चिन्तन चिर छै।
उनका लेली जगत निशा
जे सत् के दिशा न जानै
नाशवान वस्तु के ही ऊ
अचल सनातन मानै
विषय-भोग के बूझि परम सुख, एकरे करै फिकिर छै।
पर निन्दा में मिलै परम सुख
हरिप्रताप नै जानै
निन्द निभोर मनुष्य स्वप्न में
जगले खुद के मानै
स्वप्न समान जगत के जानोॅ, इहेॅ सत्य आखिर छै।
जिनकोॅ इन्द्रिय सब विधि संयत, उनके बुद्धि स्थिर छै।