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गुनी जनन सें / हरगोविन्द सिंह

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या तौ सब कृपा तुम्हार आय।

मैंने कुछ डरे-परे रोरा
जब गाँस बए जाघन-ताघन,
तुम ओखें मन्दिर कहन लगे
थापो देबी कौ सिंघासन;
यौ धुजा-नारियल तुम जानों
मोरौ कन्नी कौ कार आय।

मैंनें माटी में डार दए
कुछ रकत-पीसना के दानें,
तब चना-चरपटा मुठी-मुठी
तुमनें हीरा-मुतियाँ मानें;
यौ घटी-मुनाफा तुम जानों
मोरौ अँधरौ रुजगार आय।

जब गमइँ-गाँव की भासा में
मैंनें अपनौ जी बहराओ
तब सुख-दुख के इन बोलन में,
तुमनें कुछ अपनों-सौ पाओ;
जेखें तुम कबिता कहन लगे
वा हिरदे कै उलछार आय।