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गुफ़्तगू ख़त्म हुई, तख़्त बचा, ताज रहा / विनय कुमार

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गुफ़्तगू ख़त्म हुई, तख़्त बचा, ताज रहा।
कौन कितने में बिका सिर्फ़ यही राज़ रहा।

मौत के डर ने शिकारी का तरफ़दार किया
एक भी बाज़ सारे दष्त तक कहाँ बाज़ रहा।

अक्स मुमकिन न हुआ आईना सजा इतना
सच की यलगार से बचने ये अंदाज़ रहा।

लफ़्ज़ के झूठ से रौनक़ बढ़ी दुकानों की
लफ़्ज़ के सच को पकड़ता लफ्फ़ाज़ रहा।

शेख़ मुजरिम था, सिपाही से पकड़ते न बना
कुछ रहा खौफे ख़ुदा और कुछ लिहाज़ रहा।

क्य़ा बताएँ कि जिए शहर-ऐ-इश्क में कैसे ख़ुदकुशी रस्म जहाँ क़त्ल एक रिवाज़ रहा।