भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

गुलाबी छाया / प्रभात कुमार सिन्हा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


सावन के आकाश को देखती हुई
लड़की हँस रही है
लड़की की आँखें उधर लगी हैं
जहाँ पनियाले बादल के पीछे सूरज छुपा है
लड़की की आँखों से
आँख-मिचौनी कर रहा है सूरज

लड़की हँस रही है आकाश देखती हुई
उसकी व्यस्त मुट्ठियों में
भरे हुए साग
हसिये पर कट-कट कर करतन बन रहे हैं
लड़की को शातिर निगाह से मत देखो लैंडलॉर्ड !
लड़की की हँसी की ताकत पहचानो
हसिये की धार पर लड़की के होठों की
गुलाबी छाया पड़ रही है
लड़की हँस है