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गेंदा के फूल / सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर'

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फूल खिले हैं गेंदा के,
गेंदा के हाँ गेंदा के!

बड़े फबीले, बड़े छबीले,
नरम नरम, सुंदर गुच्छीले।
पीले-पीले, लाल-लाल,
फूल खिले हैं डाल-डाल।

कई तितलियाँ उड़ती हैं,
इधर-उधर को मुड़ती हैं।
पंख हिलाती, पंख मिलाती,
सब की सब फुर्ती दिखलाती।

फूलों से ये बार-बार,
हिलमिल करती लाड प्यार।
भौंरे आते कई-कई
लिये उमंगें नई-नई!

गुनगुन गाते, खुशी मनाते,
फूलों से फूलों पर जाते।
रस चखते हैं चाह, चाह,
बड़ा मज़ा है वाह-वाह!

-साभार: बालसखा, अक्तूबर 1940, पृ. 424