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गोया तो वचली पीपली रे / मालवी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात


गोया तो वचली या पीपल रे वीरा जाँ चड़ जोउँ थारी वाट
माड़ी जाया चूनड़ लाया गोया तो वचली पीपल रे वीरा...

लावो तो सगला सारू लावजो रे वीरा नी तो रे रीजो हमारा देस
जामण जाया चूनड़ लावो।

संपत होय ओ आवजो रे वीरा नी तो रे रीजो तमारे देस
जामण जाया चूनड़ लावो।

संपत थोड़ो रे रिण घणो वो बेन्या पचाँ में राखूँ थारी सोब
जामण जाया चूनड़ लावो।

काँकड़ वचली या पीपली रे वीरा जाँ चड़ जोउँ थारी वाट
माड़ो जाया चूनड़ लावो।

लावो तो सगला सारू लावजो रे वीरा नी तो रे रीजो तमारे देस
जामण जाया ।

संपत थोड़ो ने रिण घणो वो बाई पचाँ में राखूँ थारी सोब
माड़ी जाई चूनड़ लावाँ।