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गौरव गाथा महतारी के / छत्तीसगढ़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

ये नाग मन के धरती जिंकर ले नग घलो थररात रिहिस ।
फणीं अऊ छिन्दक राजा मन के ध्वज हा लहरात रिहिस ।।
पाण्डव के पार्थ पौत्र परीक्षित ल जेन हा ललकारिन ।
लड़त मेरठ के तीर रण में तक्षक हा उनला मारिस ।।
अड़बड़ वीर मन के धरती ये छत्तीसगढ़ महतारी हे ।
ज्ोमां रत्न भरे खान, सरल-सुघर- सुन्दर सुजानी हे ।।
अइसन मनखे के माटी में बारुद बोवत हे मक्कार ।
अइसन मनखे के चिंहारी कर करना हे नक्कार ।।
ये वीरनारायण की धरती दाऊ दयाल के माटी हे ।
इंकर रक्षा हित बर मिटना वीर मन के परिपाटी हे ।।
मांदर के थाप सुनके इहां शेर के टांग घलो कांपथे ।
आदिवासी के तीर विरोधी के देह घलो वोहा नापथे ।।
काबर येमन भोला-भाला के मन मा जहर घोरथें ।
लोहा के सिक्का के बल मा ईमान ला तोलथें ।।
अउ कतका दिन तुमन अइसने कटवाहू ?
जेन दिन सब संभलहीं कुटका में बंट जाहू ।।
वो दिन माटी के बेटा धरती के करजा उतारहीं ।
अउ खोज-खोज के सब मक्कार ला मारहीं ।।
जंगल मा कोयली मैना पंख अपन फहराही ।
धरती धान के बाली ले चारों मुड़ा लहराही ।।
ताला के रुद्र छोड़ ताण्डव तब मंद-मंद मुस्काहीं ।
छत्तीसगढ़ के वासी कपूत जनगणमन ला गाही दे ।।