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ग्वालिन करि दे मौल दही कौ / ब्रजभाषा

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

ग्वालिन करि दै मोल दही कौ मोकूमाखान तनक चखाय॥ टेक

सुन गोरी बरसाने वारी,
नेंक चखाय दै माखन प्यारी
आज मान लै बात हमारी।
मटुकी के दरसन करबाय दे, क्यों राखी दुबकाय॥ 1॥

नाय तौ आज समझ ले मन में,
काऊ दिन हाथ परैगी बन में,
सबरी कसर निकरूँ छिन में,
लकुटी मार फोर दऊँ मटकी, लउँगो दान चुकाय॥ 2॥

साँच समझलै नाहै धोखौ,
जा दिन मेरौ लग जाय मोकौ,
दही तेरौ बिकवाय दउँ चोखौ।
चारी करें ाज तेरे घर में पहले दउँ जताय॥ 3॥

पनघट पै भरवे जाय पानी,
मोय तेरी गागरि लुढ़कानी,
यही हमारी रीति पुरानी।
अबहु समझि ‘श्याम’ समझावै, फिर पाछे पछताय॥ 4॥