घर वापस जाने की सुध-बुध बिसराता है मेले में / प्राण शर्मा
घर वापस जाने की सुध-बुध बिसराता है मेले में
लोगों की रौनक में जो भी रम जाता है मेले में
किसको याद आते हैं घर के दुखड़े, झंझट और झगड़े
हर कोई खुशियों में खोया मदमाता है मेले में
नीले-पीले, लाल-गुलाबी पहनावे हैं लोगों के
इन्द्र धनुष का सागर जैसे लहराता है मेले में
सजी सजाई हाट-दुकानें खेल-तमाशे और झूले
कैसा- कैसा रंग सभी का भरमाता है मेले में
जेबें खाली कर जाते हैं क्या बच्चे और क्या बूढे
शायद ही कोई कंजूसी दिखलाता है मेले में
तन तो क्या मन भी मस्ती में झूम उठता है हर इक का
जब बचपन का दोस्त अचानक मिल जाता है मेले में
जाने-अनजाने लोगों में फ़र्क नहीं दिखता कोई
जिस से बोलो वो अपनापन दिखलाता है मेले में
डरकर हाथ पकड़ लेती है हर माँ अपने बच्चे का
ज्यों ही कोई बिछुड़ा बच्चा चिल्लाता है मेले में
ये दुनिया और दुनियादारी एक तमाशा है भाई
हर बंजारा भेद जगत के समझाता है मेले में
रब न करे कोई बेचारा मुँह लटकाए घर लौटे
जेब अपनी कटवाने वाला पछताता है मेले में
राम करे हर गाँव - नगर में मेला हर दिन लगता हो
निर्धन और धनी का अन्तर मिट जाता है मेले में.