संध्या के नभ को
सिन्दूरी उपहार।
घाटी के पार।
सपनों की मेड़ों पर
कस्तूरी गंध लिये;
पौध नहीं पनपी
विश्वासी सम्बन्ध लिये;
जीना है, छाती पर
रखकर अंगार।
बंद द्वार के भीतर
मन को हुलसा जातीं;
पद चापें चुपके से
देहरी तक आ जातीं;
स्मृतियों की बिजली ले
मोहक झंकार।
घाटी के पार।
संतापों के तकिये
सिरहाने रख सोना;
मेहनत के खेतों में
खुशबू के घर बना;
सुख-दुख के फल सारे
मन को स्वीकार।
घाटी के पार।