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घृणा भी गोल है / नेहा नरुका

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हम जो किसी को देते हैं
हमारे पास भी वही लौटता है
प्रेम देते हैं तो प्रेम लौटता है
घृणा देते हैं तो घृणा लौटती है

यह दुनिया गोल है
आओ इस बात का निर्धारण करने लिए एक काल्पनिक गड्ढा खोदें
अगर हम भारत में यह गड्ढा खोदते हैं तो पता है अन्दर से क्या निकलेगा ? पाताललोक ?
नहीं ! अन्दर से निकलेगा अमेरिका !!

जैसे देश खोदने पर देश निकलता है
धर्मस्थल खोदने पर धर्मस्थल
ठीक उसी तरह घृणा खोदने पर घृणा निकलती है
तुम खोदते जाते हो, खोदते जाते हो प्रेम की तलाश में
उससे निकलती जाती है, निकलती जाती है घृणा

फिर एक दिन ऐसा आता है प्रेम का मलबा भी नहीं बचता
मिलता जाता है , मिलता जाता है घृणा का ऊबड़-खाबड़ मैदान, नुकीला पहाड़, विषैली घाटी, बर्फ़ीला पठार, खौलता समुद्र

तुम कहते जाते हो, कहते जाते हो — देखो, कितना सुन्दर, अद्भुत्त, कल्याणकारी है घृणा का गड्ढा
तुम गिरते जाते हो, गिरते जाते हो उस गड्ढे में

गड्ढा पटता जाता है, पटता जाता है घृणा के कंकालों से
यह दुनिया गोल है
घृणा भी गोल है ।

2023-24