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चतुर्थ प्रकरण / श्लोक 1-6 / मृदुल कीर्ति

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आत्म ज्ञानी धीर जन के, कर्म अतिशय गूढ़ हैं,
जग लिप्त जन से साम्यता, किंचित करें वे मूढ़ हैं.----१
 
देवता इन्द्रादि भी, इच्छुक हैं जिस पद को मही,
स्थित उसी पद पर अहो! योगी को किंचित मद नहीं.-----२

निर्लिप्त अंतस पाप -पुण्य से, आत्म ज्ञानी का रहे,
ज्यों गगन का धूम से ,सम्बन्ध किंचित न रहे.------३

विश्वात्मा के रूप में, देखा जगत जिस संत ने,
उसे कोई इच्छित कार्य से, नहीं रोक सकता अनंत में.------४

ब्रह्मा से पर्यंत चींटी, चार जीव प्रकार हैं,
बस विज्ञ को इच्छा अनिच्छा, त्याग पर अधिकार है.-------५

है आत्मा परमात्म मय, कोई विरला जानता,
ज्ञानी ही निर्द्वंद केवल कर सके जो ठानता .--------६