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चन्द्रमा बेचारे लज्जित होते बाटिका देख / महेन्द्र मिश्र

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 चन्द्रमा बेचारे लज्जित होते बाटिका देख,
भानु कुछ देर ठाढ़ रोज ही निहारे हैं।
त्रिभुवन की शोभा वह छीन लीन्हों जनक बाग,
राग तो छतीसो वहाँ सुनने की बहार है।
कौन ऐसी शोभा जाहि देखोगे न बाग माहीं,
जाको छवि देखि-देखि मोहित संसार है।
द्विज महेन्द्र रामचन्द्र चलो जी हमारे संग,
जनक जी के बाग में बसंत की बहार है।