भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चपटी भरी चोखा / गुजराती लोक गरबा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

चपटी भरी चौखा ने घी नो छे दिवडो

हे श्रीफल नी जोड़ लई ने हालो हालो पावागढ़ जैई ये ने..


सामे नी पोळ थी मालिडो आवे....

ऐ गजरा नी जोड़ लई ने हालो हालो पावागढ़ जैई ये ने.....

चपटी भरी चौखा ने घी नो छे दिवडो......


सामे नी पोळ थी डोसिडो आवे....

ऐ चुंदरी नी जोड़ लई ने हालो हालो पावागढ़ जैई ये ने.....

चपटी भरी चौखा ने घी नो छे दिवडो....


सामे नी पोळ थी कुम्भारी आवे...

ऐ माता नो गरबो लई ने हालो हालो पावागढ़ जैई ये ने.....

चपटी भरी चौखा ने घी नो छे दिवडो....


सामे नी पोळ थी सुथारी आवे....

ऐ बाजट नी जोड़ लई ने लई ने हालो हालो पावागढ़ जैई ये ने.....

चपटी भरी चौखा ने घी नो छे दिवडो....


चपटी भरी चौखा ने घी नो छे दिवडो....

हालो हालो पावागढ़ जैई ये ने.....