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चर्चगेट का प्लेट्फॉर्म / अनूप सेठी

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शाम के समय जब प्लेटफार्म बहुत व्यस्त होता है
ढलती धूप के चौकोर टुकड़े
पैरों से खचाखच भरते जाते हैं
रीत जाते हैं फिर भर जाते हैं

दीवारों पर लगे बड़े पँखों की हवा में
सांस लेने पसीना सुखाने
किसी का इँतजार करने को
रुक जाते हैं कई लोग

दो-दो मिनट में लोगों का रेला आता है
दनदनाता धकियाता
छूता आसपास
गुजर जाता है

जैसे टयूब वैल का बंबा
छूटता है रुक रुक कर
कलकल करता सिहराता जज्ब हो जाता है
खेतों की मिट्टी के रग रेशे में

बहुत सारे पैरों को
प्लेटफार्म की रोशनी के हवाले कर
धूप चली जाएगी मैरीन ड्राइव की तरफ
समुद्र में उतर जाएगा सूरज
नई दुनिया की टोह लेता

दो-दो मिनट में लोगों का रेला
दिन भर के काम से थका
ट्रेनों में ठुँस कर निकल जाएगा
घरों की दूसरी दुनिया को

टयूब वैल के बंबे का छलछलाता पानी
मिट्टी के रग रेशे में जान डालता है
ठंडी ताजी महक सी उठती है
पसीने में रची हुई

बड़े पँखों की हवा के नीचे
बेहद व्यस्त प्लेटफार्म
बहुत सारे शोर में
उम्मीद की आहट देता है
चर्चगेट बहुत सुदर दिखता है।
                       (1983)