भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चलता चल / रमेश रंजक

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

थोड़ी-थोड़ी
धरती रोज़ बदलता चल
                         चलता-चल।

जीवन धर्मी तार तरल सम्वेदन के
टूट रहे कारण बन कर इनके-उनके

चलता चल
भीतर-बाहर एक मरुस्थल
                         जलता चल।

ध्वनि का धर्म उदास अजब सूनापन है
मूर्छित रेत खेत में पड़ता सावन है

चलता चल
बादल है तो पल प्रतिपल
                         गलता चल।