भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

चलती है क़लम जब कभी उनवान से आगे / रवि सिन्हा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चलती है क़लम जब कभी उनवान[1] से आगे
अल्फ़ाज़ की मंज़िल कहीं इरफ़ान[2] से आगे

उम्मीद तो रखिए कि ये वहशत भी थकेगी
सुनते हैं सुकूँ है कहीं विज्दान[3] से आगे

चाहो तो नए दैर[4] में मूरत भी बिठा लो
जाना है मगर ख़ल्क़[5] को भगवान से आगे

तारीख़ ने हर बार सज़ा उसको सुनाई
पहुँचा जो ख़बर ले के वो तूफ़ान से आगे

दुनिया जो चली थी किसी इन्सान के पीछे
दुनिया का सफ़र अब उसी इन्सान से आगे

रोटी की जगह केक के जुमले पे बग़ावत
फैले तो कोई बात फिर ऐवान[6] से आगे

ज़ाहिर में ख़ुदी रक़्स[7] में है बज़्मे-बरहना[8]
बातिन[9] के सरोकार हैं पहचान से आगे

अब किसको मसर्रत[10] से ग़रज़ क्यूँ हो तमाशा
निकले जो हुए हम किसी अरमान से आगे

तरतीबे-अनासिर[11] से तसव्वुर[12] की ठनी है
चलते हैं हक़ीक़त के हर इम्कान[13] से आगे

शब्दार्थ
  1. शीर्षक
  2. विवेक
  3. हर्षोन्माद
  4. मन्दिर
  5. लोग
  6. महल
  7. नृत्य
  8. नंगों की सभा
  9. अन्तर्मन
  10. आनन्द
  11. पंचतत्त्व की संरचना
  12. कल्पना
  13. सम्भावना