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चला आ रहा हूँ समंदरों के विसाल से / नून मीम राशिद

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चला आ रहा हूँ समंदरों के विसाल से
कई लज़्जतों का सितम लिए
जो समंदरों के फ़ुसूँ में है
मेरा ज़ेहन है वो सनम लिए
वही रेग-ज़ार है सामने
वही रेग-ज़ार के जिस में इश्‍क के आइने
किसी दस्त-ए-ग़ैब से टूट कर
रह-ए-तार-ए-जाँ में बिखर गए !
अभी आ रहा हूँ समंदरो की महक लिए
वो थपक लिए जो समंदरों की नसीम में
है हज़ार रंग से ख़्वाब-हाए-ख़ुनुक लिए
चला आ रहा हूँ समंदरों का नमक लिए

ये बरहनगी-ए-अज़ीम तेरी दिखाऊँ मैं
जो गदा-गरी का बहाना है
कोई राह-रू हो तो उस से राह की दास्ताँ
मैं सुनूँ फ़साना समंरों को सुनाऊँ मैं
के समंदरों का फ़साना इश्‍क़ की गस्तरश का फ़साना है

ये बरहनगी जिसे देख कर बढ़े दस्त ओ पा न खुले जुबाँ
न ख़याल ही में रहे तवाँ
तू वो रेग-ज़ार कि जैसे रह-ज़न-ए-पीर हो
जिसे ताब-ए-राह-ज़नी-ए-पीर हो
के मिसाल-ए-ताएर-ए-नीम-जाँ
जिसे याद बाल-ओ-परी न हो
किसी राह-रौ सम उम्मीद-ए-रहम ओ करम लिए
मैं भरा हुआ हूँ समंदरो के जलाल से
चला आ रहा हूँ मैं साहिलों का हशम लिए
है अभी इन्हीं की तरफ़ मेरा दर-ए-दिल खुला
का नसीम-ए-ख़ंदा को रह मिले
मेरी तीरगी को निगह मिले
वो सुरूर ओ सोज़ सदफ़ अभी मुझे याद है
अभी चाटती है समंदरों की जुबाँ मुझे
मेरे पाँव छू के निकल गई कोई मौज साज़ ब-कफ अभी
बो हलावतें मेरे हस्त ओ बूद में भर गईं
वो जज़ीरे जिन के उफुक हुजूम-ऐ-सहर से दीद-बहार थे
वो परिंदे जिन की सफ़ीर में थीं रिसालातें
अभी उस सफ़ीर की जल्वतें मेरे खूँ में हैं
अभी ज़ेहन है वो सनम लिए
चला आ रहा हूँ समंदरो के जमाल से
सदफ़ ओ किनार का ग़म लिए