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चलो मन बँसरी बजावे / छत्तीसगढ़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

चलो मन बँसरी बजावे जिहाँ मोहना रे, राधा रानी नाचे ठुमा–ठुम
रास रचावे जिँहा गोकुल गुवाला रे, मृदँग बाजे धुमा-धुम ,
मोर सुवा न मृदँग बाजे धुमा-धुम ॥
तरी हरी नहा नरी नना मोर सुवा न , तरी हरी नहा नरी नना

जमुना के खड़ मे कदम के बिरखा, नाचथे मँजुरा अव फुदकथे मिरगा ,
खेतले कछार जिहाँ बोलथे पपीहरा रे , कलपथे हाबे पाना फुल ।
रास रचावे जिँहा गोकुल गुवाला रे, मृदँग बाजे धुमा-धुम ,
मोर सुवा न मृदँग बाजे धुमा-धुम ॥
तरी हरी नहा नरी नना मोर सुवा न , तरी हरी नहा नरी नना ।

रूनझुन घुनझुन जिँहा कदम के छईहाँ , नाचथे गुवालिन जिँहा जोरे जोरे बईँहा
झाँझ मजिँरा जिँहा झमके झमाझम रे, घुँघरू सुनाथे छुनाछुन ॥
रास रचावे जिँहा गोकुल गुवाला रे, मृदँग बाजे धुमा-धुम ,
मोर सुवा न मृदँग बाजे धुमा-धुम ॥
तरी हरी नहा नरी नना मोर सुवा न , तरी हरी नहा नरी नना

कल-कल छल छल , छलकथे जमुना , झनन झनन झनके तारा अव तमुरा ।
महर महर बन म मन लेय लहरा ले , भँवरा गुँजावे गुनागुन
रास रचावे जिँहा गोकुल गुवाला रे, मृदँग बाजे धुमा-धुम ,
मोर सुवा न मृदँग बाजे धुमा-धुम ॥

चलो मन बँसरी बजावे जिहाँ मोहना रे, राधा रानी नाचे ठुमा–ठुम
रास रचावे जिँहा गोकुल गुवाला रे, मृदँग बाजे धुमा-धुम ,
मोर सुवा न मृदँग बाजे धुमा-धुम ॥
तरी हरी नहा नरी नना मोर सुवा न , तरी हरी नहा नरी नना