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चल-चित-पारद की दंभ केंचुली कै दूरि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’

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चल-चित-पारद की दंभ केंचुली कै दूरि
ब्रज-मग धूरि प्रेम-मूरि सुभ-सीली लै ।
कहै रतनाकर सु जोगनि बिधान भावि
अमित प्रमान ज्ञान-गंधक गुनीली लै ॥
जारि घट अन्दर हीं आह-धूम धारि सबै
गोपी बिरहागिनि निरन्तर जगीली लै ।
आए लौटि ऊधव भव्य बिभूति भायनि की
कायनि की रुचिर रसायन रसीली लै ॥104॥