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चाँदनी रात, क्या करे कोई? / बलबीर सिंह 'रंग'

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चाँदनी रात, क्या करे कोई?
चंद लमहात, क्या करे कोई?

सुन लिया और हो गये खामोश,
आप से बात, क्या करे कोई?

आलमे दो जहाँ में रोशन हूँ,
फिर मुलाक़ात, क्या करे कोई?

हम तो अपने सनम के शैदा हैं,
होंगे सुक़रात, क्या करे कोई?

‘रंग’ से बज़्म को परेशानी?
वक़्त की बात, क्या करे कोई?