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चाँदनी रात में खुली खिड़की / राम नाथ बेख़बर

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चाँदनी रात में खुली खिड़की
दूधिया रंग में धुली खिड़की।

शोखियाँ देख कर हवाओं की
गीत गाती है चुलबुली खिड़की।

चाँद को कमरे तक ले आने की
बच्चों सी ज़िद पे है तुली खिड़की।

ओस की बूँद ज्यों पड़ी तन पे
मोम सी रात भर घुली खिड़की।

मेरे कमरे के दिल को भाती है
चाँदनी रात में धुली खिड़की।