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चाँद अकेला है / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
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सूने अम्बर में मेरा चाँद अकेला है।
हिचकी ले रही हवा ये कैसी बेला है।
आँसू भीगी पलकें, उलझी हैं अब अलकें
आँसू पोंछे ,सुलझा दे अब हाथ न सम्बल के
उलझन में हरदम जीवन छूटा मेला है।
सन्देश सभी खोए,किस बीहड़ जंगल में
हूक- सी उठती है ,रोने को पल पल में।
पीड़ाएँ अधरों पर आकरके सोती हैं
बीती बातें भी यादों में आ रोती हैं।
पलभर को रुका नहीं आँसू का रेला है ।
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