Last modified on 15 अप्रैल 2008, at 18:22

चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

चाँद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का

दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुस्रव-ए-शिरीं-दहन
आज रिज़ा हो कोई हर्फ़ शनासाई का

दीदा-ओ-दिल को सम्भालो कि सर-ए-शाम-ए-फ़िराक़
साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का