भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

चारागर / मख़दूम मोहिउद्दीन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चारागर[1]

इक चम्बेली के मंडवे तले
मयकदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर
दो बदन
प्यार की आग में जल गए
प्यार हर्फ़े वफ़ा[2]
प्यार उनका ख़ुदा
प्यार उनकी चिता
दो बदन
ओस में भीगते, चाँदनी में नहाते हुए
जैसे दो ताज़ा रू[3] ताज़ा दम फूल[4] पिछले पहर
ठंडी-ठंडी सबक रौ[5] चमन की हवा
सर्फ़े मातम हुई
काली-काली लटों से लिपट गर्म रुख़सार पर
एक पल के लिए रुक गई
हमने देखा उन्हें
दिन में और रात में
नूरो जुल्मात में
मस्जिदों के मीनारों ने देखा उन्हें
मन्दिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हें
मयकदे की दरारों ने देखा उन्हें
अज़ अज़ल ता अबद[6]
ये बता चारागर
तेरी जन्बील[7] में
नुस्ख़-ए-कीमियाए मुहब्बत[8] भी है
कुछ इलाज व मदावा-ए-उल्फ़त भी है ?
इक चम्बेली के मड़वे तले
मयकदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर
दो बदन ।

शब्दार्थ
  1. वैद्य
  2. निष्ठा का अक्षर
  3. आत्मा
  4. ताज़ा खिले हुए फूल
  5. मंद गति से चलने वाली
  6. दुनिया के पहले दिन से दुनिया के अंतिम दिन तक
  7. थैले में
  8. प्रेम के उपचार का नुस्ख़ा