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चारों ओर / समीर बरन नन्दी

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दिन भर मणिधर सूर्य
जीभ से ब्रह्माण्ड की चिता लपट-सी सुनहरे रंग को चाट कर
एक लाल कीड़े की तरह चला गया है ।

चारों ओर --
आदमी के मुँह में जैसे रह गया है अन्धेरा ।