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चारो दुलहा देत भमरिया हे / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

सिंदूर-दान के पूर्व अग्निकुंड के पास भाई अपनी बहन के हाथ में धान या धान का लावा देता है, जिसे वह अपने पति के हाथ में गिरा देती है और पति उसे बिखेर देता है। कहीं कहीं, दुलहा लड़की की अंजलि को ही पकड़कर लावा को छितरा देता है। भाई बहन के हाथ में धान का लावा इसलिए भरता है कि जिस प्रकार धान पहले एक खेत में बोया जाता है, फिर उसे उखाड़कर दूसरे खेत में रोपा जाता है, जहाँ वह फूलता-फलता है, उसी प्रकार लड़की पितृ-गृह में पैदा होती है और पति-गृह में फूलती-फलती है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि धान जब छिलके के साथ रहता है तभी उसमें उत्पादन की क्षमता रहती है। केवल चावल में उत्पादन की क्षमता नहीं रहती। उसी प्रकार लड़की के लिए छिलके की तरह उसके पति का संरक्षण बना रहना चाहिए, जिससे वह फूले-फले। तीसरा कारण यह हो सकता है कि भाई बहन की अंजलि धान से कई बार इसलिए भरता है कि पिता के बाद घर पर उसका ही प्रभुत्व होगा। पिता के बाद जब-जब बहन इस घर में आयगी, उसकी अंजलि इसी प्रकार मरी जायगी और उसका आदर-सत्कार इसी प्रकार होता रहेगा। इस लौकिक विधि में वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति की ओर संकेत है।

प्रस्तुत गीत में भाँवर भरने तथा वर द्वारा सुपती के लावा को बिखरने का उल्लेख है।

चारो दुलहा देत भमरिया[1] हे, सँग सोभित जनक दुलरिया हे।
रतन जड़ित केर सुपती मौनियाँ हे, लाबा छिरियाओ बर चरिया[2] हे॥1॥

शब्दार्थ
  1. भाँवर; विवाह के समय की जाने वाली अग्नि की परिक्रमा
  2. चार की संख्या