भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चुसणा मा / धनेश कोठारी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बस्स
बोट येक दे ही द्या
हात ज्वड़्यां खुट्टम् प्वड़दां
बक्कै बात हमुन जाणि
किलै कि/ भोळ् त
चुसणा मा

 

अबि तलक पैटै अथा च
हौर बोला हांगु भोरा
बांटी चुंटी खै, क्य बुरू
तुम जनै नि पौंछी
हमरि भौं
चुसणा मा

 

रंग्यु स्याळ् आज रज्जा
रंगदारा बि त तुम छां
चित्तबुझौ ह्वां-ह्वां त कर्दा
तब्बि तुम अधीता/ त
चुसणा मा

 

जरनलुं का जुंगा ताड़ा
भरोसु इथगा कम त नि च
लेप्प रैट आज हमरि
भोळ् तुमरि/ गै
चुसणा मा

 
पांच सालौ चा त ‘गैर’
हम्मुं पुछा, सैंणा मा हम
भाग जोग सबुं अपड़ु
उकाळ् चड़दा तुम/ त
चुसणा मा


‘बत्ती’ बतुला हमरा ट्वपला
लाठी लठैत हमरा झगुला
अब चुप!!!
अर
भौं-भौं बि करिल्या/ त
चुसणा मा

 
चीर हात द्रोपदा कु
खैंचा ताणि हमुन् जाणिं
ग्वालों का छां, ग्वोलौं का छां, हम
कृष्ण तुम/ त
चुसणा मा