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चूल्हा-चक्की / रमेश तैलंग

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छोटे-छोटे बर्तन,
चूल्हा-चक्की है,
मेरी भी छोटी-सी,
एक गिरस्ती है।

पूरे दिन में का न जाने
कितने करने पड़ते हैं,
उस पर गुड्डे-गुड़ियों के,
नखरे भी सहने पड़ते हैं।
इनको बहलाना बस, माथा-पच्ची है।

धोवा-धोई बाद रसोई
सीना और पिरोना फिर,
सब निबटाकर देर रात में,
मिल पाता है सोना फिर।
सच, मुझको तो एक मुसीबत लगती है।
मम्मी जाने कैसे ये सब करती है?