Last modified on 10 नवम्बर 2009, at 10:56

चैत्र की हवायें और वह लड़की / आलोक श्रीवास्तव-२

  
और फिर एक बार लौट आया है प्यार
चैत्र की हवायें थीं बाहर
सड़कों पर झुलसे दरख़्तों की परछाइयां
जल चुकी थी पहाड़ी पर की घास
और एक लड़की तपती दोपहरियों
और उमस से भरी शामों में
बसों से चढ़ती-उतरती
नीले दुपट्टे को अपनी छाती पर संभालती
लौटती थी घर

बस में कभी-कभार होतीं उससे बातें
उसकी हंसी, आंखें, उसकी शालीन उड़ती लटों से
मोहित था मैं
निश्छल सादगी बन कर प्यार लौट आया था
बीते वसंत के पेड़ों पर नयी कोपलें थीं
और रात के आकाश पर समूचा चांद

बहुत-बहुत दिनों तक नहीं मिलती वह
मैं उदासी का वज़न उठाये-उठाये उन्हीं रास्तों से गुज़रता
एक झलक पा लेने की उम्मीद में
समुद्र की लहरों से पूछता उसके घर का पता
प्यार और विछोह के अतीत के हर अनुभव से
सघनतर होता दिनोदिन यह प्यार
अजीब-सी कसक बन उठा भीतर

जब सारा शहर रौशनी में डूब जाता
सो जाता सारा शहर
और सिर्फ सागर की लहरें चट्टानों पर गूंजतीं
एक खोयापन हवाओं पर अचानक तारी हो उठता
इन्हीं हवाओं में उलझी उसकी लटें मुझे मुग्ध कर गयीं थीं

दिनों बाद जब वह मिलती
खु़शी रगों में वसंत के फूल बन खिल उठती
हवाओं में उड़ते नीले दुपट्टे और उलझती लटों को
चूम लेने की कामना उमगती

चैत्र की साक्षी में लौटे इस प्यार की कथा अभी जारी है ...
हालांकि अरसे से देखा नहीं है उसे
इसी शहर की भीड़ में कहीं खोया होगा वह चेहरा
किन्हीं हवाओं में चेहरे पर घिर आती उन लटों की गंध होगी
उमस भरी शामों में लौटते दो थके पैर होंगे
अपरिचित मेरी इस उदासी से ।