छंद 263 / शृंगारलतिकासौरभ / द्विज

दुर्मिल सवैया
(हास्य-वर्णन)

कलधौत, कपूर, कलानिधि, कुंद, हँसी-ही-हँसी अति मंद किए।
मुख-बात तैं कंज-सुगंध-सनेऊ, पराजित पौंन दुचंद किए॥
‘द्विजदेव’ कटाच्छ ही तैं छन-जौंन्है के, दूरि सबै छल-छंद किए।
पिक, चातक, मोर, चकोरन के, इक बात ही तैं मुख बंद किए॥

भावार्थ: भगवती वाग्देवी पुनः कवि से बोलीं कि हे द्विजदेव! एक और नई वार्त्ता तुमने क्या कभी सुनी है? उस ‘कृष्ण-प्रिया’ प्यारी ने रजत, कर्पूर, चंद्रमा और कुंद को हँसी-ही-हँसी में हतप्रभ कर दिया अर्थात् हँसते-खेलते या बिना प्रयास ही इन सबों को मंद कर दिया। दूसरा अर्थ-ये चारों हँसी के उपमान हैं, अतएव हास्य से ही मंद किए गए एवं मुख की बात (स्वाँस) से सुगंधमय पù पुंज-परिमल मिश्रित पवन को द्विगुण पराजित किया अर्थात् बात-की-बात (क्षणमात्र) में पराभव कर डाला तथा तीक्ष्ण कटाक्ष की चंचलता से चंचला (बिजली) के चांचल्य को दूर कर दिया, यानी बिना परिश्रम ही उसको भी निमिषमात्र में जीत लिया और कोकिल, चातक, मयूर, चकोर आदि मधुर स्वरवाले पक्षियों को एक बात ही में मौनावलंबन करा दिया अर्थात् एक ही वचन में उनका मानमर्दन कर डाला तो ये सब उपमान भी व्यर्थ ही हो गए। (इस कवित्त में ‘हँसी-ही-हँसी’, ‘कटाच्छ ही तैं’ ‘एक बात ही तैं’ इन तीनों (पदों) में व्यंग्य है।)

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