भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

छंद 39 / शृंगारलतिकासौरभ / द्विज

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दोहा

कबहुँक राधा के ललित, अंगन की दुति देखि।
करैं बचन-रचना बिबिधि, सुमुखि सुसखी बिसेखि॥

भावार्थ: कभी श्रीराधिका के रुचिर अंगों की शोभा देख, कोई सुंदरी सखी, दूसरी सखी से वाक् चातुरी द्वारा उसका वर्णन करती है।