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छंद 70 / शृंगारलतिकासौरभ / द्विज

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किरीट सवैया
(परस्पर प्रेम-वर्णन)

ज्यौं घनस्याम-से स्याम बने, त्यौं प्रिया तड़िता-सी हिए मैं परैं तकि।
आँगन-चंद की दीपति देखि, दुहूँन के नैन-चकोर रहे छकि॥
ऐसी बिनोद-कला निरखैं, ‘द्विजदेव’ न कौंन की डीठि रहै चकि।
ज्यौं बिकसी अरबिंद-सी प्यारी, मलिंद-सौ तैसौई प्यारौ रह्यौ जकि॥

भावार्थ: राधा-राधरमण का अनन्वय प्रेमाधिक्य का वर्णन कर कवि मंगल करते हैं कि जैसी घनश्याम सदृश ‘श्री कृष्णचंद्र’ की शोभा है वैसी ही उनके हृदइय में तड़िता सदृश ‘श्रीराधाजी’ भी विराजमान हैं, अर्थात् जैसे घन से दामिनी पृथक् नहीं हो सकती उसी तरह ये दोनों दंपती परस्पर अलग नहीं हो सकते। दोनों के मुख-चंद्र और दोनों के नैन-चकोर परस्पर अनुरक्त हैं। नेत्र, मुख-चंद्र दर्शन से चकोर की भाँति आनंदित होते हैं। ऐसी आनंद की कला देखि हे द्विजदेव! किसकी दृष्टि चकित नहीं होती, क्योंकि जैसे कमल की तरह ‘श्रीराधाजी’ का मुख विकसित है वैसे ही भ्रमररूपी भगवान् भी जके-चके से उस कमल की भाँवरे भरते हैं।