Last modified on 24 मई 2016, at 22:12

छपरी पे कागा बोलै हुनकोॅ सगुन भाखै / अनिल शंकर झा

छपरी पे कागा बोलै हुनकोॅ सगुन भाखै
लागै प्राणधन हरषित चल्लो आवै छै।
फड़कै छै अंग-अंग मुसकै सेहो अनंग
पात-पात सिहरी की जानौ की बतावै छै।
अजगुत बात एक हवा हू पेॅ एक टेक
जानलोॅ सुगंध केना यहू लेनेॅ आबै छै।
सुखलोॅ जे तोॅन छेलै पाबी कोन धोॅन गेलै
क्षणें क्षण बाढ़ै अंग आंगी नै समावै छै॥