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छलछलाती इक नदी-सी जिंदगी / रंजना वर्मा

छलछलाती इक नदी-सी ज़िन्दगी।
कट रही पल-पल सदी-सी ज़िन्दगी॥

हैं बड़े सपने बड़ी अच्छाइयाँ
और इनमें बस बदी-सी ज़िन्दगी॥

एक पग भर विश्व का सर्जन जहाँ
है गमों की शतपदी-सी ज़िन्दगी॥

मिले सौ-सौ वर्ष या फिर एक क्षण
हर खुदी में बेखुदी-सी ज़िन्दगी॥