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छोटी किरण / भावना कुँअर

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मेरा आस्तित्व
बहुत ही बौना है ।
बड़ी हस्तियाँ
जाने क्या हैं चाहती
जहाँ मैं जाऊँ
वहीं पहुँच जातीं ।
अदना - सी है
बस मेरी तो ख्याति ।
फिर भी क्यों वो
है उनको डराती?
छोटी किरण
हाथ में लेकर मैं
अपने लिये
छोटा- सा रोशनी का
प्यारा -सा गाँव
भावों की इक झील
नन्हे-नन्हे- से
विचारों के कमल
खु़शबू -भरी
प्रेम से सराबोर
शब्दों की आत्मा
तैराना हूँ चाहती ।
पर जाने क्यों
बना दी जाती,बड़ी
मुश्किल और
कँटीली राहें मेरी
बस बीनती
एक-एक काँटे को
बना लेती हूँ
जोड़के इक घर।
आश्वस्त हूँ मैं
आ ना पाए कोई भी
काँटों से डर।
न मैं मज़बूर हूँ
न ही कलम
अब न बिखरेगी
न ही टूटेगी
बेधड़क होकर
दौड़ेगी ये कलम।