भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जगाओ फिर बापू के भाव / जगदीश सहाय खरे 'जलज'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

देस में कैसौ दंगा मचौ!
खेल जौ सैतानन नें रचौ,

बरै जौ जात-पाँत कौ नसा
देश की कर डारी दुरदसा,
जगाओ फिर बापू के भाव
किनारें तबइँ लगा पैऔ नाव।

दनुजता बोलत जिन्दाबाद
मनुजता हो रइ मुरदाबाद,
भीतरइँ भुँजत मुरादाबाद
बरेली बरत इलाहाबाद,

देहली मेरठ मोदीनगर,
अलीगढ़ चुरत गाजियाबाद।
भँवर में फँसी नाव खौं देख
डुबाबे पोंच जात जल्लाद।

महा साँतर जो लुंगा मरत
साँड़ से सबरइँ छुट्टाँ चरत,
सहर में जौन लफंगा बरत
बेइ पुंगा तो दंगा करत।
लैन नइँ देत काउ खौं चैन
बैन खों जे नइँ समझत बैन,
टूट परतइ इज्जत खों लेन
लोहू सें लीपत नीच उरैन।

मनुज-तन-धारी बिसधर नाग
लगा रए जे दंगन की आग,
उगल रए देस बैर कौ झाग
सहीदन के लोहू सें सिँचौ
उजारत नन्दनबन-सौ बाग।

न चूकत अत्याचारी दाँव
देस खौं इनसें आज बचाव,
किनारें तबइँ लगा पैऔ नाव
जगाऔ फिर बापू के भाव।

एक हैं जाँके राम-रहीम,
एक हैं जाँके कृष्ण-करीम,
एक से तुलसी-सूर-कबीर
भरे रस सें रसखान रहीम,
एक से सबखौं बैद हकीम
एक सँग पुजतइ सइयद बली
इतै के सालिगराम-सलीम।

बाबरे बैजू कौ संगीत
कि जीनें लए जड़-चेतन जीत,
बौइ है तानसेन की तान
करे बस में सम्राट महान,
लता खौं का हिन्दुवइ सुनत?
रफ खौं बस तुरकन के कान?
विधाता कौ साँचौ है एक
हमइँ तुम करतइ भेद अनेक।
दौर कैं दो उगरें लग जाव
बीरबल अकबर जैसे चाव,
मेंट के भेदभाव के भरम
छोड़ दो सबरे कपट-दुराव,
जगाऔ फिर बापू के भाव,
किनारें तबइँ लगा पैऔ नाव।

छिड़ी जब आजादी की जंग
लड़े गोरन सें सबरे संग
भगत सिंह चन्द्रसेखर आजाद
न भूलत कोउ बिसमिल की याद।
सहीदन कौ नायक असफाक,
निछावर हो गऔ बीर हमीद
करी ऊँची भारत की नाक;
याद आ गओ हुमायूँ आज
बचा लइ करमवती की लाज,
आज के जे समाज के ताज
न इनखौं कौनउँ सरम-लिहाज!

बोउत रत रोज जहर के बीज
करत फिर जेइ कोढ़ में खाज,
बिगारत बेइ डाँकधर मर्ज
कि जिनके हाँतन होत इलाज।
जेइ रए कलपबृच्छ खौं काट
न सूजत इनखौं भाव-कुभाव,
जगाऔ फिर बापू के भाव
किनारे तबइँ लगा पैऔ नाव।

सिक्ख, मुसलिम, हिन्दू, ईसाई
सुमित में रतते सबरे भाई
कितै सें कीनें गुँजी लगाई!
सगी माँ सबकी भारत माई
हिमालय-सी जीकी ऊँचाई,
अरब सागर जैसी गहराई
पवन कै रइ जीकी प्रभुताई;
जनम भर जाँकौ पानी पियो
देवतन जैसी देह बनाई।
जितै को रज में खो-खो खेल
आज ज्वानी ऐसी गर्राई,
भाई की घिची काट रए भाई
खून सें खेलत क्रूर कसाई।

न रै गऔ इनखौं नकउ कूत
करोरन में जेइ कड़े कपूत
कि इन्नें माँ की कोख लजाई
जगत्तर भर में नाक कटाई।

डुबा डारो बापू कौ नाम
बिलख रए बरधा-साबरमती
सिसक रऔ सबरौ सेवाग्राम।
थूक रऔ इनपै सब संसार
जेइ तो बरत भूमि के भार,
अहिंसा की नित हिंसा करत,
प्रेम-पोथी चूले में धरत,
सत्त अभमन्यू कौ वध करत
जेइ तौ करवाउत टकराव।

नए हों चाय पुराने घाव
न इनपै नोंन-मिर्च भुरकाव,
प्रेम की मरहम इन्हें लगाव।
भाइचारे के भरकें भाव,
नेह सें नित्त इन्हें सहलाव
आज फिर बिछरे गर्रे लगाव
प्रेम के अँसुवन सें सपराव,
आज फिर भरत-मिलाप कराव
जगाऔ फिर बापू के भाव,
किनारें तबइँ लगा पैऔ नाव।