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जज़्ब है जग की ज़माने की हवा में क्या-क्या / रवि सिन्हा

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जज़्ब है जग की ज़माने की हवा में क्या-क्या
साँस घोले है रग-ए-जाँ[1] में बलाएँ[2] क्या-क्या

दिल को क्या फ़िक्र वहाँ आप ही का मौसम है
जिस्म पर देखिये छाती हैं घटाएँ क्या-क्या

वादि-ए-ज़ीस्त[3] को कुहसार-ए-ख़िज़ाँ[4] से देखा
और गिनता रहा लाती थीं बहारें क्या-क्या

क्या कहें हाल-ए-ख़िरद[5] अक़्ल से मंतिक़[6] छूटा
दिल मगर पेश किये जाय दलीलें क्या-क्या

राज़ तो ख़ैर फ़साहत[7] ने छुपा रक्खे थे
बयाँ करती थीं वो ख़ामोश निगाहें क्या-क्या

आबो-गिल[8] का ये मकाँ क़ैद किसे होना था
खड़े करती है मगर रूह फ़सीलें[9] क्या-क्या

नातवाँ[10] से भी दरख़्तों की जड़ें गहरी हैं
चार सू[11] दश्त[12] हैं धरती पे सँवारें क्या-क्या

धूल उड़ती है बयाबाँ में हैं शक्लें रक़्साँ[13]
पर्दा-ए-ख़ाक से दिखता है ख़ला[14] में क्या-क्या

ख़ुद की तसवीर उतारी है मगर क्या भेजूँ
अक्स-ए-रू[15] पे खिंची हैं ये लकीरें क्या-क्या

शब्दार्थ
  1. ख़ून की मुख्य नाड़ी (jugular vein)
  2. विपत्तियाँ (calamities)
  3. जीवन की घाटी (valley of life)
  4. पतझड़ का पहाड़ (mount of autumn)
  5. बुद्धि (intellect)
  6. तर्क, गणित (logic)
  7. सरल भाषा जो आसानी से समझ में आए (eloquence)
  8. पानी और मिट्टी (water and soil)
  9. चारदीवारियाँ (boundaries)
  10. कमज़ोर (weak)
  11. चारों तरफ़ (all around)
  12. जंगल (forest)
  13. नाचती हुई (dancing)
  14. अन्तरिक्ष (interstellar space)
  15. चेहरे का प्रतिबिम्ब (image of face)