भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जबसे तुमने किया किनारा / महाराज सिंह परिहार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जबसे तुमने किया किनारा
टूट गया मेरा इकतारा ।
साँस-साँस में कम्पन होती
मिटा भाग्य का आज सितारा ।।

हमने तुमने स्वप्न बुने थे
चाँद सितारे भी अपने थे ।
साथ रहेंगे, साथ चलेंगे
एक-दूजे के लिए बने थे ।।

मधुर मिलन की बंशी बजती
खुशियाँ रोज़ द्वारे झरती ।
सोना लगता था वह दिन
उपवन में जब तुम मिलती ।।

सूरज भी हमसे जलता था
चंदा भी नित-नित गलता था ।
फूलों की मुस्कानें रोती
हाथ भँवरा भी मलता था ।।

मैंने तुमसे प्रीत बढ़ाई
तुम भी मंद-मंद मुस्काई ।
अम्बर धरती लगा चूमने
रजनीगंधा भी इठलाई ।।

आज बिखर गए सपने सारे
बदल गए नदिया के धारे ।
अलगावों के बादल छाए
बदल गए अब मीत हमारे ।।

तेरे रूप का रहा पुजारी
लेकिन तुम निकली पाषाणी ।
होम दिया अपने को तुम पर
रूप नगर की ओ महारानी ।।

तुमने अपने पथ को मोड़ा
गै़रों से अब रिश्ता जोड़ा ।
प्यार मिला नफ़रत पीऊँगा
यादों में तेरी जीऊँगा ।।