भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जब्र-ए-शही का सिर्फ़ बग़ावत इलाज है / हसन 'नईम'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब्र-ए-शही का सिर्फ़ बग़ावत इलाज है
अपना अज़ल से एक हुसैनी मिज़ाज है

आगे तो ज़हर-ए-इश्‍क़ में सब ज़हर थे घुले
अब शाइरी की जान रग-ए-एहतिजाज है

आली नज़र के शेर पे तीखे मुबाहिसे
बे-नूर आलिमों का मरज़ ला-इलाज है

हर आन हैं दिमाग़ में अफ़कार-ए-शब-नवाज़
इस ग़म की सल्तनत में बस इक दिल सिराज है

क्या दी है लब-कुशाई की क़ीमत उसे भी देख
इस दफ़्तर-ए-नवा में सभी इंदिराज है

इस सोंधी मिट्टियों ने दिया रंग ओ ज़ाएका
हीरों से बढ़ के आब में मुल्की अनाज है

‘इकबाल’ की नवा से मुशर्रफ है गो ‘नईम’
उर्दू के सर पे ‘मीर’ की ग़ज़लों का ताज है