भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

जब कभी महफ़िल ज़रा सुनसान कुछ हो जायगी / गोविन्द राकेश

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब कभी महफ़िल ज़रा सुनसान कुछ हो जायगी
तब वफ़ा भी यहाँ बेईमान कुछ हो जायगी

रास्ते में जो मिला अनजान-सा दिखता रहा
दोस्ती तो इस क़दर हैरान कुछ हो जायगी

मुस्कुरा कर जब कहें जैसा कहें मैं मान लूँ
इल्ति़ज़ा फिर इस तरह फ़रमान कुछ हो जायेगी

जब कभी मेरी ग़ज़ल पर भी बजेगी तालियाँ
तब अदीबों में मेरी पहचान कुछ हो जायेगी

झील ना दरिया कुआँ भी अब नहीं होता यहाँ
प्यास की भी रूह तब हल्कान कुछ हो जायेगी