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जब तक न लहू दीद-ए-अंजुम से टपक ले / नासिर काज़मी

जब तक न लहू दीद-ए-अंजुम से टपक ले
ऐ दिल क़फ़से-जां में ज़रा और धड़क ले

ज़र्रा हैं हवस के भी ज़रे-नाबे-वफ़ा में
हां जिसे-वफ़ा को भी ज़रा छान-फाटक ले

फिर देखना उसके लबे-लाली की अदाएं
ये आतिशे-ख़ामोश ज़रा और दहक ले

गूंगा है तो लब-बस्तों से आदाब-ए-सुख़न सीख
अंधा है तो हम ज़ुल्मरसीदों से चमक ले

'नासिर' से कहे कौन कि अल्लाह के बन्दे
बाक़ी है अभी रात, ज़रा आंख झपक ले