जब तक न लहू दीद-ए-अंजुम से टपक ले
ऐ दिल क़फ़से-जां में ज़रा और धड़क ले
ज़र्रा हैं हवस के भी ज़रे-नाबे-वफ़ा में
हां जिसे-वफ़ा को भी ज़रा छान-फाटक ले
फिर देखना उसके लबे-लाली की अदाएं
ये आतिशे-ख़ामोश ज़रा और दहक ले
गूंगा है तो लब-बस्तों से आदाब-ए-सुख़न सीख
अंधा है तो हम ज़ुल्मरसीदों से चमक ले
'नासिर' से कहे कौन कि अल्लाह के बन्दे
बाक़ी है अभी रात, ज़रा आंख झपक ले