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जब बिटि त्यरा हत्यूँ कु पाणि पे ग्योंउ / महेन्द्र ध्यानी विद्यालंकार

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जब बिटि त्यरा हत्यूँ कु पाणि पे ग्योंउ
सच ब्वनूँ त्यरा सौं अफु से दूर ह्वे ग्योंउ।

त्यारु दगड़ु समझि मिन डांडौं को छोया
सौण सूखि मैखुणि तिसाल़ु रै ग्योंउ।

दुख कि राति काटि मिन आँख्यूँ आँख्यूँ मा
भाग जागि देल़ि ऐ निरभगि मि से ग्योंउ।

मी गरीबै आँख्युंन त कुम्भ नि देखी
बेटि बिवै ब्याल़ि सच मि गंगा न्है ग्योंउ।

ब्याल़ि तक पुजेन्दु छौ मि सिरिगणेश सी
ऐंसु साल का चुनौ म मोल़ ह्वे ग्योंउ।

दुखि होंद त खोज कर्दि सुख मा पुछदि नि
त्वे खुणि मि बस खतड़ि को खोल़ ह्वे ग्योंउ।

जौं मा छन कल़दार त्यरा खास ह्वेगेनि
तेरि दुन्या से मि अब बूखु सी छिटे ग्योंउ।