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जब माँ नहीं होती है / उषा उपाध्याय

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माँ नहीं होती है जब
तब वैसे तो कुछ नहीं होता
पिताजी ऑफिस जाते है
दादी माला फेरती है
मनु कॉलेज जाता है...
सब कुछ होता है
पर जैसै फीका-फीका-सा लगता है
बिना शक्कर की चाय जैसा।
 
माँ नहीं होती है जब
कोई डाँटता नहीं है,
मनु रात को जब देर से लौटता है
तब अधीर होकर बार-बार
खिडकी से कोई झाँकता नहीं है,
घड़ी की सुईयाँ बरछी-तलवार जैसी नहीं हो जातीं,
किसी की व्याकुल आँखो से
अभी गिरा कि अभी गिरेगा
ऐसे अदृश्य आँसुओं की माला नहीं झूलती,

गले में अटके हुए रोने की आड़ में
डाँट को पीकर
कोइ मनु से पूछता नहीं है
"थक गया होगा, बेटा,
थाली परोस दूँ क्या ?"

माँ नहीं होती है जब
सुबह वैसे ही होती है
पर पूजाघर मैं बैठी दादी को
दिये की बाती नहीं मिलती,
भगवान को बूँदी के लड्डू का प्रसाद नहीं मिलता,
पिताजी को गंजी, बटुआ, चाबी नहीं मिलते,
रसोईघर में से छोंक लगाने की
ख़ुशबू तो आती है
पर उस में
जली हुई सब्ज़ी की गंध
घुल-मिल जाती है,

पंछियों के लिए रखा पानी सूख जाता है
पंछी बिना दाने के उड़ जाते हैं
और तुलसी के पौधे सूख जाते है...

माँ नहीं होती है जब
तब वैसे तो कुछ नहीं होता,
यानी
कुछ भी नहीं होता है।

मूल गुजराती से अनुवाद : स्वयं कवयित्री द्वारा