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जमादार की बेटी सूं मैं खोल सुणाऊं सारी हे / रामधारी खटकड़

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जमादार की बेटी सूं मैं खोल सुणाऊं सारी हे
जिन्दगी बीतै सै कष्टां म्हं, मोटी सै लाचारी हे
 
पेट भरण की खातर हमने भारी दुखड़ा ठाणा हो
सिर पै मैला, कूड़ा, कचरा दूर फैंक कै आणा हो
करां सफाई गळियां की न्यूं अपणा फर्ज पुगाणा हो
रूखा-सुखा टुकड़ा हमनै घर-घर जाकै ल्याणा हो
मर-मर कै या जीवै जग म्हं दलित जात की नारी हे
 
कोय मस्टण्डा देख कै हमने, अपणी नीत डिगाया करै
भूण्डे-भूण्डे करें इशारे, अपणे घरां बुलाया करै
कदे पिस्से का लालच दे कै हरे-हरे नोट दिखाया करै
इज्जत कारण ना बोलां पर शर्म भतेरी आया करै
जी म्हं आवै गुण्डे कै इब मारुं खींच कटारी हे
 
मजदूरी भी करां खेत म्हं, मेहनत करकै जिया करां
छूआछात भी मिट्या नहीं सै, चीज दूर तै लिया करां
न्याय मिलता नहीं किते भी, खूब दुहाई दिया करां
पंचायत भी सै ठाढ़े की, घूंट सबर की पिया करां
समाज म्हं कती कद्र नहीं या सबतै बुरी बीमारी हे
 
बेड़ी तोड़ बगाणी हो इब होल्यो सब तैयार सखी
इसे जीणे तै मरणा आच्छा रोज रह्या जो मार सखी
आसमान तक ईब उठाओ क्रान्ति की गुंजार सखी
सही दिशा म्हं चाल्लो सब बणकै खुद हथियार सखी
रामधारी का भी खून उबळज्या, ऐसी द्यो किलकारी हे
जिन्दगी बीतै सै कष्टां में, मोटी सै लाचारी हे